परम् सत्य ने अपनी माया शक्ति के
द्वारा अपने को समस्त सृष्टि में विस्तरित समस्त रूपों में प्रगट किया है । यह
समस्त रूपों के लिये समान रूप से लक्ष्य है कि उस परम् सत्य को जाने और उसकी उपस्थिति
अपने अंदर अनुभव करे । इस आलोक में यह विचार कि परम् सत्य ने किसी एक विषेस समय
अथवा किसी एक विषेस अवसर पर एक विशिष्ट मानव शरीर में अपने अपरिमित सत्य रूप को
सीमित किया बलहीन अभिव्यक्ति कही जावेगी ।
रविवार, 30 नवंबर 2014
शनिवार, 29 नवंबर 2014
आदर्श का प्रतीक
परम् सत्य तो इस सृष्टि के कण कण
में विद्यमान है । मनुष्य शरीर में विद्यमान आत्मा तो परम् ब्रम्ह का ही अंश है ।
प्रकृति ब्रम्ह की रचना है । यह परम् ब्रम्ह की माया का प्रभाव होता है कि आत्मा
प्रकृतीय मोंह में आसक्ति जनित कर अपनी गरिमा खो बैठता है । अवतारी पुरुष इसी खोई
हुई गरिमा को पुन: स्थापित करता है । वह प्रथमचरण में अपनी आत्मा को माया के
प्रभाव से मुक्ति दिलाता है । पुन: अपनी शरीर की प्रकृति को आत्मा की गरिमा से
संतृप्त करता है । इन प्रयत्नों के द्वारा वह मनुष्य शरीर में परम् ब्रम्ह का ओज
पैदा करता है । वह परम् ब्रम्ह के अवतार के रूप में जाना जाता है । मनुष्य शरीर
द्वारा चर्मोत्कर्ष आदर्श उपलब्धि है अवतार ।
शुक्रवार, 28 नवंबर 2014
अस्तित्व और रूप
अस्तित्व ग्रहण करना यह इस संसार
का प्रचलित व्यवहार है । इसी प्रकार रूप धारण करना भी इस संसार का प्रचलित व्यवहार
होता है । यह दोनो ही व्यवहार परम् ब्रम्ह पर लागू कर यह कहना कि अवतार में परम्
ब्रम्ह मनुष्य शरीर ग्रहण करता है या दूसरे शब्दों में यह कहना कि अवतार में परम्
ब्रम्ह मनुष्य शरीर धारण कर प्रगट हुआ है अर्थविहीन अभिव्यक्तियाँ हैं । इस प्रकार
की अभिव्यक्तियों द्वारा परम् ब्रम्ह की मर्यादा का हनन करना है |
गुरुवार, 27 नवंबर 2014
प्रकृति का विकास
अवतार परम् ब्रम्ह का मानव शरीर की
सीमाओं में सीमित करना नहीं होता है अपितु मानव शरीर की प्रकृति को देवत्व की
सीमाओं तक विकसित करना होता है । आत्मा की प्रधानता का जीवन बनाने द्वारा यह विकास
सम्भव होता है । आत्मा प्रयास के प्रथम चरण में प्रकृतीय मोंह से मुक्त बनायी जाय
पुन: द्वितीय चरण में शरीर की प्रकृति को आत्ममय बनायी जाय तो प्रगट होगा अवतार
पुरुष ।
बुधवार, 26 नवंबर 2014
मनुष्य में छिपा देवत्व
अवतार यह विदित करता है कि एक आम
मनुष्य के अंदर देवत्व का कितना दिव्य स्वरूप विद्यमान रहता है । कृष्ण भी एक आम
मनुष्य की भाँति ही जन्में थे । अपने अंदर विद्यमान परम् सत्य को उन्होने पहचाना
और तद्नुसार जीवन की शक्तियों को उन्होने जागृत किया जिसके फलस्वरूप वह अवतार
पुरुष बने । अवतार ब्रम्ह की गरिमा का मनुष्य जीवन होता है ।
मंगलवार, 25 नवंबर 2014
विषय और वस्तु स्वरूप
इस संसार का विषय ( आत्मा ) और
वस्तु ( प्रकृति ) से निर्मित समस्त स्वरूप मात्र अभिव्यक्ति हैं । दोनों ही परम्
सत्य के ही रूप हैं । जिस व्यक्ति में विषय स्वरूप की चेतना विकसित होकर वस्तु
स्वरूप से विरक्ति करा देती है वही मनुष्य संकीर्ण स्वार्थ से ऊपर उठकर सम्पूर्ण
मानव समाज के कल्याण के लिये चेष्टारत हो जाता है । ऐसे मनुष्य के लिये ही कहा
जाता है कि भगवान ने जन्म लिया है और वह असुरी प्रवृत्तियों का दमन कर सद्वृत्तियों
का साम्राज्य स्थापित करेंगे ।
सोमवार, 24 नवंबर 2014
परम् सत्य अजन्मा
परम् सत्य सदैव अजन्मा ही होता है
। जन्म और मृत्यु की सीमायें परम् ब्रम्ह के लिये लागू नहीं हो सकती हैं । मनुष्य
के आत्मचेतना जागृत होने की दशा में मुक्त आत्मा ब्रम्ह के साथ एकीकृत हो जाने की
स्थिति उस मनुष्य को अवतारी पुरुष बना देती है । सामान्य मनुष्य में जन्मा हुआ
व्यक्ति आत्मचेतना जागृत होने पर मुक्त आत्मा की स्थिति प्राप्त कर लेने पर अवतारी
पुरुष बन जाता है ।
रविवार, 23 नवंबर 2014
ब्रम्ह चेतना के प्रतीक
अवतारी पुरुष की मुक्त आत्मा अपने
शरीर को ब्रम्ह के प्रगट होने का स्थल बनाती है । जो ब्रम्ह स्वरूप कृष्ण को
प्राप्त हुआ वह किसी भी मुक्त आत्मा धारक को प्राप्त होगा । ऐसा नहीं है कि कृष्ण
एक बार धरती पर आये और उपदेश करके चले गये । वह सदा विद्यमान हैं और हम सभी को
मार्ग दिखाने को तत्पर हैं । प्रश्न है कि यदि हम आत्मा और ब्रम्ह को जानने और
अनुभव करने को तत्पर हैं । यह आत्मा चेतना है जिसके वह प्रतीक हैं ।
शनिवार, 22 नवंबर 2014
आत्मा और ब्रम्ह एकीकृत
अहंकार एक भिन्न अस्तित्व का बोध
कराता है । यही अवाँक्षित होता है । आदर्ष स्वरूप होता है जब आत्मा अपने स्वरूप
में ब्रम्ह का दर्शन पावे । यही स्थिति अवतारी पुरुष को प्राप्त हो जाती है । यह
उनका प्रतिपल का सत्य अनुभव बन जाता है । उनके जीवन का प्रतिपल ब्रम्ह की गरिमा के
अनुरूप होता है ।
भगवद्गीता में
योगेश्वर श्रीकृष्ण बताते हैं “ मोंह से मुक्त आत्मा, जिसे भय और क्रोध के वेग नहीं सताते, उसका मुझमें विलय हो जाता है, उसका अस्तित्व मेरे स्वरूप में विलीन हो जाता है, वह स्वयं परम् सत्य स्वरूप हो जाता है । “ यह स्थिति ही अवतार कही जाती है ।
शुक्रवार, 21 नवंबर 2014
कौसितकी उपनिषद में वृतांत
इंद्रदेव प्रतर्दना से कहते हैं “ मैं ही वायु हूँ, मैं ही परम् ब्रम्ह हूँ । मेरी उपासना करो । जो मेरी
उपासना दीर्घायु होने के लिये करेगा और अमरत्व प्राप्त करने के लिये करेगा उसे इस
संसार में पूर्ण आयु का जीवन मिलेगा तथा स्वर्ग में उसे अमरत्व मिलेगा । “ यह वक्तव्य भी अवतार की धारणा का ही पोषक है । जब मुक्त आत्मा परम् सत्य के
साथ विलय का अनुभव करने लगती है तब उसका आचरण परम् सत्य की गरिमा के अनुरूप हो
जाता है । वही मनुष्य अवतार पुरुष बन जाता है ।
ऋगवेद में वृतांत
विद्वान मुनि बामदेव कहते हैं “ मैं मनु हूँ. मैं सूर्य हूँ, मैं विद्वान ऋषि काकसिवान हूँ. मैं संत उस्ना हूँ, ... ... ।
“ यह वृतांत अवतार की धारणा का पोषक है । किसी व्यक्ति की आत्मा जब मुक्त दशा
में हो जाती है तो वह परम् सत्य के साथ विलय का अनुभव करने लगती है । उसके कर्म
परम् सत्य की गरिमा के अनुरूप हो जाते हैं । अवतार का यही स्वरूप होता है ।
मंगलवार, 18 नवंबर 2014
उपनिषद का मत
जिन्हे पूर्णरूप से अपनी आत्मा का दर्शन मिल गया है । जिनकी
आत्मा पूर्णरूप से प्रकृतीय मोंह से मुक्त हो गई है । ऐसी आत्मा परम् सत्य का चिंतन
करते हुये यह अनुभव करती है कि उसका अपना रूप पूर्णतया परम् सत्य जैसा ही है । ऐसा
अनुभव आने पर उस मुक्त आत्मा का आचरण पूर्णरूप से परम् सत्य की गरिमा के अनुसार हो
जाता है । वह अवतार पुरुष बन जाता है ।
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