मंगलवार, 18 नवंबर 2014

उपनिषद का मत

जिन्हे पूर्णरूप से अपनी आत्मा का दर्शन मिल गया है । जिनकी आत्मा पूर्णरूप से प्रकृतीय मोंह से मुक्त हो गई है । ऐसी आत्मा परम् सत्य का चिंतन करते हुये यह अनुभव करती है कि उसका अपना रूप पूर्णतया परम् सत्य जैसा ही है । ऐसा अनुभव आने पर उस मुक्त आत्मा का आचरण पूर्णरूप से परम् सत्य की गरिमा के अनुसार हो जाता है । वह अवतार पुरुष बन जाता है । 

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