परम् सत्य ने अपनी माया शक्ति के
द्वारा अपने को समस्त सृष्टि में विस्तरित समस्त रूपों में प्रगट किया है । यह
समस्त रूपों के लिये समान रूप से लक्ष्य है कि उस परम् सत्य को जाने और उसकी उपस्थिति
अपने अंदर अनुभव करे । इस आलोक में यह विचार कि परम् सत्य ने किसी एक विषेस समय
अथवा किसी एक विषेस अवसर पर एक विशिष्ट मानव शरीर में अपने अपरिमित सत्य रूप को
सीमित किया बलहीन अभिव्यक्ति कही जावेगी ।
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