यदि कंचिद प्रकृति में यह क्षमता
होती कि वह एक ऐसे मानव शरीर की रचना करती जो कि निराकार परम् ब्रम्ह को साकार रूप
प्रदान कर देवे अथवा अपनी वंश परम्परा शक्ति द्वारा परम् ब्रम्ह के साक्षात् रूप
को वंशों में अंतरित कर सकती तो सम्भवतया परम् ब्रम्ह का स्वत: अस्तित्व ही
प्रश्नवाचक बन जाता । इस आधार पर परम् ब्रम्ह का किसी मानव शरीर में सीमित हो जाना
स्वत: एक निराधार अभिव्यक्ति बन जाती है ।
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