परम् सत्य ने, अपने स्वयँ प्रत्येक प्राणी में उपस्थित रहते हुये भी, सभी को चुनाव की स्वतंत्रता दे रखी है । परंतु जब कभी मानव समाज गलत चुनाव के
परिणाम स्वरूप अराज़क समाज का विकास कर लेता है तो फिर समाज के उत्थान के लिये किसी
ना किसी को आत्मबोध और आत्मीय जीवन की स्थिति प्राप्त होती है जिसे कि तत्कालीन
काल में अवतार कहा जाता है । यह अवतारी व्यक्ति अधर्म के पंक में फँसे समाज को
अधर्म से उबार धर्मवत् पथ पर चलाने के लिये युग प्रवर्तक का दायित्व निर्वाह करता
है ।
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