यह वृतांत ग्रंथ महाभारत से उद्घृत
किया जा रहा है । परम् सत्य ने इस मानव समाज को बनाया भी है और वही इसका रक्षक भी है । इस रक्षा के क्रम में उसके
चार रूप हैं - ( 1 ) वह इस समाज में रहकर इंगित करता रहता है कि क्या गलत किया है
इंसान ने ( 2 ) दूसरे रूप में वह त्रुटि बरतते समाज के कृतों की निगरानी करता रहता
है ( 3 ) मानव समाज के कलापों में संलग्न हो उन्हे सम्पन्न कराता है ( 4 ) चौथे
रूप में वह हठात् निद्रा की अवस्था में हो जाता है ।
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