यदि कंचिद अवतार को परम् सत्य का
मानव शरीर में अवरोह माना जाय तो इसका सरल अभिप्राय यह निकलता है कि मनुष्य शरीर
की प्रकृति ब्रम्ह की अभिव्यक्ति के लिये बाधक नहीं होती है । इस कथन के विपरीत
एक सामान्य मनुष्य जो प्रकृतीय मोंह से आशक्त दशा में है के आत्मा की अभिव्यक्ति
शरीर की प्रकृति द्वारा बाधित रहती है । आत्मचेतना और मोहाशक्त आत्मा में यही
प्रगट भेद होता है । आत्म चेतना की दशा के व्यक्ति के लिये शरीर की प्रकृति ब्रम्ह
की अभिव्यक्ति के लिये एक यंत्र का कार्य करती है ।
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