बुधवार, 10 दिसंबर 2014

प्रकृति बाधक अथवा यंत्र

यदि कंचिद अवतार को परम् सत्य का मानव शरीर में अवरोह माना जाय तो इसका सरल अभिप्राय यह निकलता है कि मनुष्य शरीर की प्रकृति ब्रम्ह की अभिव्यक्ति के लिये बाधक नहीं होती है । इस कथन के विपरीत एक सामान्य मनुष्य जो प्रकृतीय मोंह से आशक्त दशा में है के आत्मा की अभिव्यक्ति शरीर की प्रकृति द्वारा बाधित रहती है । आत्मचेतना और मोहाशक्त आत्मा में यही प्रगट भेद होता है । आत्म चेतना की दशा के व्यक्ति के लिये शरीर की प्रकृति ब्रम्ह की अभिव्यक्ति के लिये एक यंत्र का कार्य करती है ।  

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें