प्रकृति के प्रति मोंह । अपने
अस्तित्व का अहंकार । इच्छाओं के सीमित दायरे में अपने को बाँधे रहना । जन्म से
हर्ष और मृत्यु से शोक । यह सभी ज्ञान प्राप्ति की बाधायें हैं । जब तक मनुष्य
इनमें फँसा है उसे सत्य की झलक मिल ही नहीं सकती है । वह कर्म संविधान के अनुरूप
कर्म करही नहीं सकता है । सत्य का लोक इन सभी से ऊपर होता है । उस सत्य लोक में
प्रवेश करने के लिये इन सभी को त्यागना होगा ।
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