शनिवार, 20 दिसंबर 2014

जगतगुरू से प्रार्थना

अंधकार में भटकते हुये जब जिज्ञासु त्रस्त हो जाता है तो वह ज्ञानी गुरू से याचना करता है कि मेरे सामने छाये अंधकार का ज्ञान के प्रकाश से निवारण कीजिये मुझे ज्ञान की शांति की शीतल छाया सुलभ कराइये । मुझमें व्याप्त समस्त ज्ञान प्राप्ति की बाधाओं का निवारण कीजिये । मेरे खोये हुये विवेक को फिर से मुझमें स्थापित कीजिये । मुझे सहीं कर्मपथ प्रशस्थ कीजिये । मेरी भटकती आत्मा को आश्रय प्रदान कीजिये । ऐसे कृतज्ञ जिज्ञासु को गुरू पूर्णता का पथ प्रशस्थ करता है । आत्मज्ञानी बनने का मार्ग प्रशस्थ करता है । 

शुक्रवार, 19 दिसंबर 2014

ज्ञान के बाधक

प्रकृति के प्रति मोंह । अपने अस्तित्व का अहंकार । इच्छाओं के सीमित दायरे में अपने को बाँधे रहना । जन्म से हर्ष और मृत्यु से शोक । यह सभी ज्ञान प्राप्ति की बाधायें हैं । जब तक मनुष्य इनमें फँसा है उसे सत्य की झलक मिल ही नहीं सकती है । वह कर्म संविधान के अनुरूप कर्म करही नहीं सकता है । सत्य का लोक इन सभी से ऊपर होता है । उस सत्य लोक में प्रवेश करने के लिये इन सभी को त्यागना होगा । 

गुरुवार, 18 दिसंबर 2014

स्वधर्म्यम

गुरू योगेश्वर कृष्ण का ज्ञान उपदेश का लक्ष्य यह था कि जिज्ञासु अनुकरण कर्ता शिष्य भी वही स्तर प्राप्त कर सके जिस स्तर पर पहुँच कर गुरू ज्ञान उपदेश कर रहा था । परम् ब्रम्ह का स्तर एक है । उस स्तर पर कोई तुलनात्मक स्थिति नहीं सम्भव होती है । जिसे ब्रम्ह का अनुभव मिल जावेगा वह स्वयँ ब्रम्ह हो जावेगा । तुलनात्मक स्थिति प्रकृति के क्षेत्र की धारणा है । ब्रम्ह लोकातीत है । ब्रम्ह का अनुभव मिलने पर अहंकार स्वत: विलीन हो जावेगा । अंधकार और प्रकाश दोनों साथ नहीं रह सकते हैं । अंधकार का अस्तित्व तभी तक है जब तक प्रकाश का प्रादुर्भाव नही हुआ है । 

बुधवार, 17 दिसंबर 2014

जगतगुरू श्रीकृष्ण

अवतार पुरुष कृष्ण समस्त मानव समाज के हित के अनुरूप जो ज्ञान उपदेश किये उसमें उन्होने आत्मा के स्वरूप को बताया उसके कर्तव्य दायित्व को बताया कर्म संविधान को बताया और सभी कुछ बताने के उपरांत चुनाव का निर्णय प्रत्येक मनुष्य द्वारा स्वयँ करने के लिये छोड दिया । गुरू के रूप में ज्ञानकी महिमा को बताया परंतु उसे हठात् किसी के ऊपर थोपा नहीं । ज्ञान के जिज्ञासु को स्वयँ यह उत्कण्ठा होनी चाहिये कि वह ज्ञान को कैसे आत्मसात् करे । ज्ञान जब स्वयँ अपना अनुभव बनेगा तभी उपयोगी होगा । मात्र बताने से कुछ नहीं मिलेगा । 

मंगलवार, 16 दिसंबर 2014

कृष्ण अवतार

विगत अनेक अंको के अवतार से सम्बंधित वृतांत का सार रूप यह है कि कृष्ण अवतार वासुदेव और देवकी की संतान के रूप में परम् ब्रम्ह का जन्म की अपेक्षा वासुदेव और देवकी की सामान्य संतान कृष्ण का ब्रम्ह स्वरूप में उन्नति अधिक पुष्ट सत्य है । मानव स्वरूप का ब्रम्ह स्वरूप में उन्नति हुई । 

सोमवार, 15 दिसंबर 2014

ब्रम्ह में उन्नति

ब्रम्ह का अंश आत्मा हम प्रत्येक के अंदर विद्यमान है । उस पर आच्छादित मोंह के हटते ही वह पवित्र ब्रम्ह रूप को प्राप्त हो जाता है । हमें परम् ब्रम्ह की ध्वनि सुनाई पडने लगेगी । हमें ब्रम्ह के पावन ज्योति के दर्शन मिलने लगेंगे । हम परम् ब्रम्ह की शक्ति से काम करने लगते हैं । हमारे अंदर विद्यमान आत्मा की अजन्मे ब्रम्ह में उन्नति हो जाती है । 

रविवार, 14 दिसंबर 2014

संसार पीछे छूटा ब्रम्ह प्रगट हुआ

मनुष्य जब इच्छाओं का त्याग करता है तो उसे अहसास होता हैं कि जैसे उसका समस्त संसार उससे विक्षुड गया है । परंतु यह स्थिति सृजित होने पर ही आत्मा का प्रकाश जीवन को प्रकाशित करेगा । एक पूर्णरूपेण नया जीवन ही प्राप्त होगा । ऐसे मनुष्य में जैसे ब्रम्ह का जन्म हो गया है । उसकी आँखों पर छाया मोंह लुप्त हो जावेगा । अब तक परवशता के कारागार में बंद आत्मा स्वतंत्रता के आकाश में मुक्त साँस लेगी । 

शनिवार, 13 दिसंबर 2014

वासुदेव व देवकी

अवतार पुरुष कृष्ण का जन्म वासुदेव व देवकी से बताया जाता है । मनुष्य के अंदर बसने वाला परम् ब्रम्ह का अंश वासुदेव और दैवी प्रकृति देवकी । हमारे अंदर बसने वाली आत्मा उत्तरोत्तर तमोंगुण व रजोगुण को सत्गुण द्वारा पराजित कर पुन: सत्गुण पर आच्छादित इच्छाओं को साफ करने पर शुद्ध स्वतंत्र हो जाती है तब हमारे विवेक पर शुद्ध आत्मा प्रकाश दीप्तिमान होता है । मनुष्य शरीर में ब्रम्ह का ज्ञान प्रगट होता है । अवतार पुरुष का जन्म होता है ।  

शुक्रवार, 12 दिसंबर 2014

अवतार का लक्ष्य

प्रकृति परम् सत्य की रचना है । प्रकृति ही ब्रम्ह की व्यवस्था है । इसी व्यवस्था के माध्यम से ब्रम्ह सृष्टि का संचालन करता है । प्रकृति नियम का साम्राज्य है । जब मानव समाज में नियमों का उलंघन एक आम प्रचलित रीति बन जाती है तब व्याप्त कु-प्रथाओं तथा उत्पन्न हुई दुर्व्यवस्था को नियंत्रित करने तथा नियम का साम्राज्य स्थापित करने के लिये अवतार होता है । एक ऐसे व्यक्तित्व का उदय होता है जिसे परम् सत्य का पूर्ण ज्ञान एवं नियमों के प्रति पूर्ण निष्ठा होती है एक अवतारी पुरूष का जन्म होता है । 

गुरुवार, 11 दिसंबर 2014

अवतार का वृतांत

भागवद् पुराण में कृष्ण अवतार का वृतांत लिखते हुये वर्णन आता है कि मध्य रात्रि के गहन अंधकार में सबके हृदय में बसने वाले परम् सत्य ने देव रूपिणी देवकी की धारणा में अपने को प्रगट किया । शाश्वत् प्रकाश पुँज गहन अंधकार में उदय हुआ । रहस्य का विमोचन गहन अंधकार की मध्य रात्रि में हुआ । ग्यान ज्योति की सत्यता को असत्य का अंधकार आच्छादित नही कर सकता है । कृष्ण अवतार का वृतांत दुर्वृत्तियों के गहन अंधकार की कालिमा के मध्य आत्मबोध रूपी ज्ञान के प्रकाश का उदय होने का दृष्टांत की लक्षणात्मक अभिव्यक्ति है । 

बुधवार, 10 दिसंबर 2014

पारलौकिक अपरिहार्य

परम् सत्य पूर्णतया पारलौकिक स्वत: अस्तित्व भी है और अपनी माया शक्ति के द्वारा संसार के समस्त रूपों का आधार भी है । इन्ही कारणों से अवतार के सम्बंध में दोनो ही मत तर्क द्वारा सही प्रमाणित होते हैं । एक मत कि परम् सत्य किसी परिस्थिति विषेस में अपने असीमित स्वरूप को मनुष्य शरीर में सीमित करता है और दूसरा मत कि मनुष्य शरीर में विद्यमान आत्मा मुक्त स्वतंत्र दशा में ब्रम्ह की पूर्णता प्रगट करती है । मनुष्य शरीर में परम् सत्य की पूर्णता को अवतार कहा जाता है । सत्य रूप में उपरोक्त दोनो ही मत एक दूसरे के पर्याय हैं । 

प्रकृति बाधक अथवा यंत्र

यदि कंचिद अवतार को परम् सत्य का मानव शरीर में अवरोह माना जाय तो इसका सरल अभिप्राय यह निकलता है कि मनुष्य शरीर की प्रकृति ब्रम्ह की अभिव्यक्ति के लिये बाधक नहीं होती है । इस कथन के विपरीत एक सामान्य मनुष्य जो प्रकृतीय मोंह से आशक्त दशा में है के आत्मा की अभिव्यक्ति शरीर की प्रकृति द्वारा बाधित रहती है । आत्मचेतना और मोहाशक्त आत्मा में यही प्रगट भेद होता है । आत्म चेतना की दशा के व्यक्ति के लिये शरीर की प्रकृति ब्रम्ह की अभिव्यक्ति के लिये एक यंत्र का कार्य करती है ।  

सोमवार, 8 दिसंबर 2014

अवतार का सत्य स्वरूप

यह विद्वानों के विचार मंथन का सदैव विषय रहा है कि अवतार परम् सत्य का मनुष्य शरीर में अवरोह है अथवा मनुष्य शरीर में विद्यमान आत्मा का मोंह से मुक्त हो स्वतंत्र दशा में परम् सत्य में विलीन होना है । प्रत्येक वह व्यक्ति जिसे अपनी आत्मा के सत्य रूप अर्थात् परम् सत्य का अंश स्वरूप मानते हुये उसके प्रति सचेत और आदर पूर्वक समर्पित भाव से रहता है वह सभी अवतारी पुरुष हैं । मानो परम् सत्य अपने को किसी मनुष्य शरीर के आवरण में ढक कर प्रस्तुत कर रहे हैं । एक निर्विवाद सत्य यह है कि बिना ब्रम्ह की कृपा के अवतारी पुरूष नहीं हो सकते । 

रविवार, 7 दिसंबर 2014

आत्मीय वृतांत का सार

आत्मा प्रधान व्यक्तित्व के व्यक्तियों के संसार में प्रचलित नियमों को यदि कंचिद एक शब्द में व्यक्त करना हो तो अवतार कहा जावेगा । यदि कंचिद परम् सत्य को मानव समाज का रक्षक माना जाय तो वह अपने इस दायित्व के निर्वाह करने के लिये एक अवतारी पुरुष को सृजित करता है जो कि समाज में व्याप्त दुष्प्रवृत्तियों का दमन करता है और नियमों का साम्राज्य स्थापित करता है  

शनिवार, 6 दिसंबर 2014

सृष्टि की संरचना और लक्ष्य

इस सृष्टि के समस्त रूपों का सृजन परम् सत्य ने शून्य से किया है । इस रचना में उन्होने निर्माण सामग्री के रूप में प्रकृति का प्रयोग किया है । इस सृष्टि का लक्ष्य इन निर्जीव रूपों को ज्ञान के प्रकाश से प्रकाशित करना है । स्मरणीय है कि इस सृष्टि में परम् सत्य को जानना ही ज्ञान है । इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिये परम् सत्य ने अपने ही अंश आत्मा को इसमें पिरोया है । जब आत्मा अपने सत्य स्वरूप को अहसास करते हुये, अपने को परम् सत्य के प्रतिनिधि के रूप में पहचानते हुये, परम् सत्य के लक्ष्य को अपने अस्तित्व का लक्ष्य मानते हुये लक्ष्य की पूर्ति में संलग्न होता है तो वह अवतारी पुरुष बनता है ।  

शुक्रवार, 5 दिसंबर 2014

अवतार का उद्देष्य

 यदि इस संसार के समस्त दु:खों एवँ कलह का कारण मात्र मनुष्य की इच्छाओं से जनित होता तो फिर मछली में कैंसर क्यों पाया जाता है । विदित है कि कुछ कमीं अबोध प्रकृति द्वारा भी होती है । अवतारी पुरुष का निखरा व्यक्तित्व सही अर्थों में यह अध्ययन करने में समर्थ होता है कि परम् सत्य के द्वारा इस सृष्टि की रचना करने में निहित उद्देष्य और इस संसार का वास्तविक रूप जो विद्यमान है में क्या भिन्नता है और वह त्रुटि कहाँ से पैदा हो रही है । वह उन त्रुटियों का निवारण भी करता है ।   

गुरुवार, 4 दिसंबर 2014

परम् सत्य के चार रूप

यह वृतांत ग्रंथ महाभारत से उद्घृत किया जा रहा है । परम् सत्य ने इस मानव समाज को बनाया भी है और वही इसका रक्षक भी है । इस रक्षा के क्रम में उसके चार रूप हैं - ( 1 ) वह इस समाज में रहकर इंगित करता रहता है कि क्या गलत किया है इंसान ने ( 2 ) दूसरे रूप में वह त्रुटि बरतते समाज के कृतों की निगरानी करता रहता है ( 3 ) मानव समाज के कलापों में संलग्न हो उन्हे सम्पन्न कराता है ( 4 ) चौथे रूप में वह हठात् निद्रा की अवस्था में हो जाता है । 

बुधवार, 3 दिसंबर 2014

पतन से उत्थान की ओर

परम् सत्य ने, अपने स्वयँ प्रत्येक प्राणी में उपस्थित रहते हुये भी, सभी को चुनाव की स्वतंत्रता दे रखी है । परंतु जब कभी मानव समाज गलत चुनाव के परिणाम स्वरूप अराज़क समाज का विकास कर लेता है तो फिर समाज के उत्थान के लिये किसी ना किसी को आत्मबोध और आत्मीय जीवन की स्थिति प्राप्त होती है जिसे कि तत्कालीन काल में अवतार कहा जाता है । यह अवतारी व्यक्ति अधर्म के पंक में फँसे समाज को अधर्म से उबार धर्मवत् पथ पर चलाने के लिये युग प्रवर्तक का दायित्व निर्वाह करता है ।  

मंगलवार, 2 दिसंबर 2014

विद्वानों का मत

धर्मदर्शन के विख्यात विद्वानों का यही मत है कि परम् सत्य प्रत्येक जीव में विद्यमान है । उनकी उपस्थिति अंश के रूप में है, सकारात्मक है, शक्तियुक्त है । उस निरापद अनंत, अभेद्य, अ-खण्ड स्वत: अस्तित्व परम् सत्य का मुनुष्य शरीर जो कि स्वयँ असत्य प्रकृति द्वारा निर्मित है के साथ सम्बंध अत्यंत आत्मीय होता है यद्यपि कि इस सम्बंध की परिभाषा करना अथवा व्याख्या करना सम्भव नहीं है । 

सोमवार, 1 दिसंबर 2014

अक्षम प्रकृति

यदि कंचिद प्रकृति में यह क्षमता होती कि वह एक ऐसे मानव शरीर की रचना करती जो कि निराकार परम् ब्रम्ह को साकार रूप प्रदान कर देवे अथवा अपनी वंश परम्परा शक्ति द्वारा परम् ब्रम्ह के साक्षात् रूप को वंशों में अंतरित कर सकती तो सम्भवतया परम् ब्रम्ह का स्वत: अस्तित्व ही प्रश्नवाचक बन जाता । इस आधार पर परम् ब्रम्ह का किसी मानव शरीर में सीमित हो जाना स्वत: एक निराधार अभिव्यक्ति बन जाती है ।  

रविवार, 30 नवंबर 2014

सृष्टि परम् सत्य का ही रूप

परम् सत्य ने अपनी माया शक्ति के द्वारा अपने को समस्त सृष्टि में विस्तरित समस्त रूपों में प्रगट किया है । यह समस्त रूपों के लिये समान रूप से लक्ष्य है कि उस परम् सत्य को जाने और उसकी उपस्थिति अपने अंदर अनुभव करे । इस आलोक में यह विचार कि परम् सत्य ने किसी एक विषेस समय अथवा किसी एक विषेस अवसर पर एक विशिष्ट मानव शरीर में अपने अपरिमित सत्य रूप को सीमित किया बलहीन अभिव्यक्ति कही जावेगी । 

शनिवार, 29 नवंबर 2014

आदर्श का प्रतीक

परम् सत्य तो इस सृष्टि के कण कण में विद्यमान है । मनुष्य शरीर में विद्यमान आत्मा तो परम् ब्रम्ह का ही अंश है । प्रकृति ब्रम्ह की रचना है । यह परम् ब्रम्ह की माया का प्रभाव होता है कि आत्मा प्रकृतीय मोंह में आसक्ति जनित कर अपनी गरिमा खो बैठता है । अवतारी पुरुष इसी खोई हुई गरिमा को पुन: स्थापित करता है । वह प्रथमचरण में अपनी आत्मा को माया के प्रभाव से मुक्ति दिलाता है । पुन: अपनी शरीर की प्रकृति को आत्मा की गरिमा से संतृप्त करता है । इन प्रयत्नों के द्वारा वह मनुष्य शरीर में परम् ब्रम्ह का ओज पैदा करता है । वह परम् ब्रम्ह के अवतार के रूप में जाना जाता है । मनुष्य शरीर द्वारा चर्मोत्कर्ष आदर्श उपलब्धि है अवतार । 

शुक्रवार, 28 नवंबर 2014

अस्तित्व और रूप

अस्तित्व ग्रहण करना यह इस संसार का प्रचलित व्यवहार है । इसी प्रकार रूप धारण करना भी इस संसार का प्रचलित व्यवहार होता है । यह दोनो ही व्यवहार परम् ब्रम्ह पर लागू कर यह कहना कि अवतार में परम् ब्रम्ह मनुष्य शरीर ग्रहण करता है या दूसरे शब्दों में यह कहना कि अवतार में परम् ब्रम्ह मनुष्य शरीर धारण कर प्रगट हुआ है अर्थविहीन अभिव्यक्तियाँ हैं । इस प्रकार की अभिव्यक्तियों द्वारा परम् ब्रम्ह की मर्यादा का हनन करना है |  

गुरुवार, 27 नवंबर 2014

प्रकृति का विकास

अवतार परम् ब्रम्ह का मानव शरीर की सीमाओं में सीमित करना नहीं होता है अपितु मानव शरीर की प्रकृति को देवत्व की सीमाओं तक विकसित करना होता है । आत्मा की प्रधानता का जीवन बनाने द्वारा यह विकास सम्भव होता है । आत्मा प्रयास के प्रथम चरण में प्रकृतीय मोंह से मुक्त बनायी जाय पुन: द्वितीय चरण में शरीर की प्रकृति को आत्ममय बनायी जाय तो प्रगट होगा अवतार पुरुष । 

बुधवार, 26 नवंबर 2014

मनुष्य में छिपा देवत्व

अवतार यह विदित करता है कि एक आम मनुष्य के अंदर देवत्व का कितना दिव्य स्वरूप विद्यमान रहता है । कृष्ण भी एक आम मनुष्य की भाँति ही जन्में थे । अपने अंदर विद्यमान परम् सत्य को उन्होने पहचाना और तद्नुसार जीवन की शक्तियों को उन्होने जागृत किया जिसके फलस्वरूप वह अवतार पुरुष बने । अवतार ब्रम्ह की गरिमा का मनुष्य जीवन होता है ।  

मंगलवार, 25 नवंबर 2014

विषय और वस्तु स्वरूप

इस संसार का विषय ( आत्मा ) और वस्तु ( प्रकृति ) से निर्मित समस्त स्वरूप मात्र अभिव्यक्ति हैं । दोनों ही परम् सत्य के ही रूप हैं । जिस व्यक्ति में विषय स्वरूप की चेतना विकसित होकर वस्तु स्वरूप से विरक्ति करा देती है वही मनुष्य संकीर्ण स्वार्थ से ऊपर उठकर सम्पूर्ण मानव समाज के कल्याण के लिये चेष्टारत हो जाता है । ऐसे मनुष्य के लिये ही कहा जाता है कि भगवान ने जन्म लिया है और वह असुरी प्रवृत्तियों का दमन कर सद्वृत्तियों का साम्राज्य स्थापित करेंगे ।  

सोमवार, 24 नवंबर 2014

परम् सत्य अजन्मा

परम् सत्य सदैव अजन्मा ही होता है । जन्म और मृत्यु की सीमायें परम् ब्रम्ह के लिये लागू नहीं हो सकती हैं । मनुष्य के आत्मचेतना जागृत होने की दशा में मुक्त आत्मा ब्रम्ह के साथ एकीकृत हो जाने की स्थिति उस मनुष्य को अवतारी पुरुष बना देती है । सामान्य मनुष्य में जन्मा हुआ व्यक्ति आत्मचेतना जागृत होने पर मुक्त आत्मा की स्थिति प्राप्त कर लेने पर अवतारी पुरुष बन जाता है ।

रविवार, 23 नवंबर 2014

ब्रम्ह चेतना के प्रतीक

अवतारी पुरुष की मुक्त आत्मा अपने शरीर को ब्रम्ह के प्रगट होने का स्थल बनाती है । जो ब्रम्ह स्वरूप कृष्ण को प्राप्त हुआ वह किसी भी मुक्त आत्मा धारक को प्राप्त होगा । ऐसा नहीं है कि कृष्ण एक बार धरती पर आये और उपदेश करके चले गये । वह सदा विद्यमान हैं और हम सभी को मार्ग दिखाने को तत्पर हैं । प्रश्न है कि यदि हम आत्मा और ब्रम्ह को जानने और अनुभव करने को तत्पर हैं । यह आत्मा चेतना है जिसके वह प्रतीक हैं । 

शनिवार, 22 नवंबर 2014

आत्मा और ब्रम्ह एकीकृत

अहंकार एक भिन्न अस्तित्व का बोध कराता है । यही अवाँक्षित होता है । आदर्ष स्वरूप होता है जब आत्मा अपने स्वरूप में ब्रम्ह का दर्शन पावे । यही स्थिति अवतारी पुरुष को प्राप्त हो जाती है । यह उनका प्रतिपल का सत्य अनुभव बन जाता है । उनके जीवन का प्रतिपल ब्रम्ह की गरिमा के अनुरूप होता है । 

भगवद्गीता में

योगेश्वर श्रीकृष्ण बताते हैं मोंह से मुक्त आत्मा, जिसे भय और क्रोध के वेग नहीं सताते, उसका मुझमें विलय हो जाता है, उसका अस्तित्व मेरे स्वरूप में विलीन हो जाता है, वह स्वयं परम् सत्य स्वरूप हो जाता है । यह स्थिति ही अवतार कही जाती है । 

शुक्रवार, 21 नवंबर 2014

कौसितकी उपनिषद में वृतांत

इंद्रदेव प्रतर्दना से कहते हैं मैं ही वायु हूँ, मैं ही परम् ब्रम्ह हूँ । मेरी उपासना करो । जो मेरी उपासना दीर्घायु होने के लिये करेगा और अमरत्व प्राप्त करने के लिये करेगा उसे इस संसार में पूर्ण आयु का जीवन मिलेगा तथा स्वर्ग में उसे अमरत्व मिलेगा । यह वक्तव्य भी अवतार की धारणा का ही पोषक है । जब मुक्त आत्मा परम् सत्य के साथ विलय का अनुभव करने लगती है तब उसका आचरण परम् सत्य की गरिमा के अनुरूप हो जाता है । वही मनुष्य अवतार पुरुष बन जाता है । 

ऋगवेद में वृतांत

विद्वान मुनि बामदेव कहते हैं मैं मनु हूँ. मैं सूर्य हूँ, मैं विद्वान ऋषि काकसिवान हूँ. मैं संत उस्ना हूँ, ...   ...  । यह वृतांत अवतार की धारणा का पोषक है । किसी व्यक्ति की आत्मा जब मुक्त दशा में हो जाती है तो वह परम् सत्य के साथ विलय का अनुभव करने लगती है । उसके कर्म परम् सत्य की गरिमा के अनुरूप हो जाते हैं । अवतार का यही स्वरूप होता है । 

मंगलवार, 18 नवंबर 2014

उपनिषद का मत

जिन्हे पूर्णरूप से अपनी आत्मा का दर्शन मिल गया है । जिनकी आत्मा पूर्णरूप से प्रकृतीय मोंह से मुक्त हो गई है । ऐसी आत्मा परम् सत्य का चिंतन करते हुये यह अनुभव करती है कि उसका अपना रूप पूर्णतया परम् सत्य जैसा ही है । ऐसा अनुभव आने पर उस मुक्त आत्मा का आचरण पूर्णरूप से परम् सत्य की गरिमा के अनुसार हो जाता है । वह अवतार पुरुष बन जाता है ।