गुरुवार, 27 नवंबर 2014

प्रकृति का विकास

अवतार परम् ब्रम्ह का मानव शरीर की सीमाओं में सीमित करना नहीं होता है अपितु मानव शरीर की प्रकृति को देवत्व की सीमाओं तक विकसित करना होता है । आत्मा की प्रधानता का जीवन बनाने द्वारा यह विकास सम्भव होता है । आत्मा प्रयास के प्रथम चरण में प्रकृतीय मोंह से मुक्त बनायी जाय पुन: द्वितीय चरण में शरीर की प्रकृति को आत्ममय बनायी जाय तो प्रगट होगा अवतार पुरुष । 

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