अवतार परम् ब्रम्ह का मानव शरीर की
सीमाओं में सीमित करना नहीं होता है अपितु मानव शरीर की प्रकृति को देवत्व की
सीमाओं तक विकसित करना होता है । आत्मा की प्रधानता का जीवन बनाने द्वारा यह विकास
सम्भव होता है । आत्मा प्रयास के प्रथम चरण में प्रकृतीय मोंह से मुक्त बनायी जाय
पुन: द्वितीय चरण में शरीर की प्रकृति को आत्ममय बनायी जाय तो प्रगट होगा अवतार
पुरुष ।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें