अंधकार में भटकते हुये जब जिज्ञासु
त्रस्त हो जाता है तो वह ज्ञानी गुरू से याचना करता है कि मेरे सामने छाये अंधकार
का ज्ञान के प्रकाश से निवारण कीजिये मुझे ज्ञान की शांति की शीतल छाया सुलभ
कराइये । मुझमें व्याप्त समस्त ज्ञान प्राप्ति की बाधाओं का निवारण कीजिये । मेरे
खोये हुये विवेक को फिर से मुझमें स्थापित कीजिये । मुझे सहीं कर्मपथ प्रशस्थ
कीजिये । मेरी भटकती आत्मा को आश्रय प्रदान कीजिये । ऐसे कृतज्ञ जिज्ञासु को गुरू
पूर्णता का पथ प्रशस्थ करता है । आत्मज्ञानी बनने का मार्ग प्रशस्थ करता है ।
शनिवार, 20 दिसंबर 2014
शुक्रवार, 19 दिसंबर 2014
ज्ञान के बाधक
प्रकृति के प्रति मोंह । अपने
अस्तित्व का अहंकार । इच्छाओं के सीमित दायरे में अपने को बाँधे रहना । जन्म से
हर्ष और मृत्यु से शोक । यह सभी ज्ञान प्राप्ति की बाधायें हैं । जब तक मनुष्य
इनमें फँसा है उसे सत्य की झलक मिल ही नहीं सकती है । वह कर्म संविधान के अनुरूप
कर्म करही नहीं सकता है । सत्य का लोक इन सभी से ऊपर होता है । उस सत्य लोक में
प्रवेश करने के लिये इन सभी को त्यागना होगा ।
गुरुवार, 18 दिसंबर 2014
स्वधर्म्यम
गुरू योगेश्वर कृष्ण का ज्ञान
उपदेश का लक्ष्य यह था कि जिज्ञासु अनुकरण कर्ता शिष्य भी वही स्तर प्राप्त कर सके
जिस स्तर पर पहुँच कर गुरू ज्ञान उपदेश कर रहा था । परम् ब्रम्ह का स्तर एक है ।
उस स्तर पर कोई तुलनात्मक स्थिति नहीं सम्भव होती है । जिसे ब्रम्ह का अनुभव मिल
जावेगा वह स्वयँ ब्रम्ह हो जावेगा । तुलनात्मक स्थिति प्रकृति के क्षेत्र की धारणा
है । ब्रम्ह लोकातीत है । ब्रम्ह का अनुभव मिलने पर अहंकार स्वत: विलीन हो जावेगा
। अंधकार और प्रकाश दोनों साथ नहीं रह सकते हैं । अंधकार का अस्तित्व तभी तक है जब
तक प्रकाश का प्रादुर्भाव नही हुआ है ।
बुधवार, 17 दिसंबर 2014
जगतगुरू श्रीकृष्ण
अवतार पुरुष कृष्ण समस्त मानव समाज
के हित के अनुरूप जो ज्ञान उपदेश किये उसमें उन्होने आत्मा के स्वरूप को बताया
उसके कर्तव्य दायित्व को बताया कर्म संविधान को बताया और सभी कुछ बताने के उपरांत
चुनाव का निर्णय प्रत्येक मनुष्य द्वारा स्वयँ करने के लिये छोड दिया । गुरू के
रूप में ज्ञानकी महिमा को बताया परंतु उसे हठात् किसी के ऊपर थोपा नहीं । ज्ञान के
जिज्ञासु को स्वयँ यह उत्कण्ठा होनी चाहिये कि वह ज्ञान को कैसे आत्मसात् करे । ज्ञान
जब स्वयँ अपना अनुभव बनेगा तभी उपयोगी होगा । मात्र बताने से कुछ नहीं मिलेगा ।
मंगलवार, 16 दिसंबर 2014
कृष्ण अवतार
विगत अनेक अंको के अवतार से
सम्बंधित वृतांत का सार रूप यह है कि कृष्ण अवतार वासुदेव और देवकी की संतान के
रूप में परम् ब्रम्ह का जन्म की अपेक्षा वासुदेव और देवकी की सामान्य संतान कृष्ण
का ब्रम्ह स्वरूप में उन्नति अधिक पुष्ट सत्य है । मानव स्वरूप का ब्रम्ह स्वरूप
में उन्नति हुई ।
सोमवार, 15 दिसंबर 2014
ब्रम्ह में उन्नति
ब्रम्ह का अंश आत्मा हम प्रत्येक
के अंदर विद्यमान है । उस पर आच्छादित मोंह के हटते ही वह पवित्र ब्रम्ह रूप को
प्राप्त हो जाता है । हमें परम् ब्रम्ह की ध्वनि सुनाई पडने लगेगी । हमें ब्रम्ह
के पावन ज्योति के दर्शन मिलने लगेंगे । हम परम् ब्रम्ह की शक्ति से काम करने लगते
हैं । हमारे अंदर विद्यमान आत्मा की अजन्मे ब्रम्ह में उन्नति हो जाती है ।
रविवार, 14 दिसंबर 2014
संसार पीछे छूटा ब्रम्ह प्रगट हुआ
मनुष्य जब इच्छाओं का त्याग करता
है तो उसे अहसास होता हैं कि जैसे उसका समस्त संसार उससे विक्षुड गया है । परंतु
यह स्थिति सृजित होने पर ही आत्मा का प्रकाश जीवन को प्रकाशित करेगा । एक
पूर्णरूपेण नया जीवन ही प्राप्त होगा । ऐसे मनुष्य में जैसे ब्रम्ह का जन्म हो गया
है । उसकी आँखों पर छाया मोंह लुप्त हो जावेगा । अब तक परवशता के कारागार में बंद
आत्मा स्वतंत्रता के आकाश में मुक्त साँस लेगी ।
शनिवार, 13 दिसंबर 2014
वासुदेव व देवकी
अवतार पुरुष कृष्ण का जन्म वासुदेव
व देवकी से बताया जाता है । मनुष्य के अंदर बसने वाला परम् ब्रम्ह का अंश वासुदेव
और दैवी प्रकृति देवकी । हमारे अंदर बसने वाली आत्मा उत्तरोत्तर तमोंगुण व रजोगुण
को सत्गुण द्वारा पराजित कर पुन: सत्गुण पर आच्छादित इच्छाओं को साफ करने पर शुद्ध
स्वतंत्र हो जाती है तब हमारे विवेक पर शुद्ध आत्मा प्रकाश दीप्तिमान होता है ।
मनुष्य शरीर में ब्रम्ह का ज्ञान प्रगट होता है । अवतार पुरुष का जन्म होता है
।
शुक्रवार, 12 दिसंबर 2014
अवतार का लक्ष्य
प्रकृति परम् सत्य की रचना है । प्रकृति
ही ब्रम्ह की व्यवस्था है । इसी व्यवस्था के माध्यम से ब्रम्ह सृष्टि का संचालन
करता है । प्रकृति नियम का साम्राज्य है । जब मानव समाज में नियमों का उलंघन एक आम
प्रचलित रीति बन जाती है तब व्याप्त कु-प्रथाओं तथा उत्पन्न हुई दुर्व्यवस्था को
नियंत्रित करने तथा नियम का साम्राज्य स्थापित करने के लिये अवतार होता है । एक
ऐसे व्यक्तित्व का उदय होता है जिसे परम् सत्य का पूर्ण ज्ञान एवं नियमों के प्रति
पूर्ण निष्ठा होती है एक अवतारी पुरूष का जन्म होता है ।
गुरुवार, 11 दिसंबर 2014
अवतार का वृतांत
भागवद् पुराण में कृष्ण अवतार का
वृतांत लिखते हुये वर्णन आता है कि “ मध्य रात्रि के गहन अंधकार में सबके हृदय में बसने
वाले परम् सत्य ने देव रूपिणी देवकी की धारणा में अपने को प्रगट किया । “ शाश्वत् प्रकाश पुँज गहन अंधकार में उदय हुआ । रहस्य का विमोचन गहन अंधकार की
मध्य रात्रि में हुआ । ग्यान ज्योति की सत्यता को असत्य का अंधकार आच्छादित नही कर
सकता है । कृष्ण अवतार का वृतांत दुर्वृत्तियों के गहन अंधकार की कालिमा के मध्य
आत्मबोध रूपी ज्ञान के प्रकाश का उदय होने का दृष्टांत की लक्षणात्मक अभिव्यक्ति है
।
बुधवार, 10 दिसंबर 2014
पारलौकिक अपरिहार्य
परम् सत्य पूर्णतया पारलौकिक स्वत:
अस्तित्व भी है और अपनी माया शक्ति के द्वारा संसार के समस्त रूपों का आधार भी है
। इन्ही कारणों से अवतार के सम्बंध में दोनो ही मत तर्क द्वारा सही प्रमाणित होते
हैं । एक मत कि परम् सत्य किसी परिस्थिति विषेस में अपने असीमित स्वरूप को मनुष्य
शरीर में सीमित करता है और दूसरा मत कि मनुष्य शरीर में विद्यमान आत्मा मुक्त
स्वतंत्र दशा में ब्रम्ह की पूर्णता प्रगट करती है । मनुष्य शरीर में परम् सत्य की
पूर्णता को अवतार कहा जाता है । सत्य रूप में उपरोक्त दोनो ही मत एक दूसरे के
पर्याय हैं ।
प्रकृति बाधक अथवा यंत्र
यदि कंचिद अवतार को परम् सत्य का
मानव शरीर में अवरोह माना जाय तो इसका सरल अभिप्राय यह निकलता है कि मनुष्य शरीर
की प्रकृति ब्रम्ह की अभिव्यक्ति के लिये बाधक नहीं होती है । इस कथन के विपरीत
एक सामान्य मनुष्य जो प्रकृतीय मोंह से आशक्त दशा में है के आत्मा की अभिव्यक्ति
शरीर की प्रकृति द्वारा बाधित रहती है । आत्मचेतना और मोहाशक्त आत्मा में यही
प्रगट भेद होता है । आत्म चेतना की दशा के व्यक्ति के लिये शरीर की प्रकृति ब्रम्ह
की अभिव्यक्ति के लिये एक यंत्र का कार्य करती है ।
सोमवार, 8 दिसंबर 2014
अवतार का सत्य स्वरूप
यह विद्वानों के विचार मंथन का
सदैव विषय रहा है कि अवतार परम् सत्य का मनुष्य शरीर में अवरोह है अथवा मनुष्य
शरीर में विद्यमान आत्मा का मोंह से मुक्त हो स्वतंत्र दशा में परम् सत्य में
विलीन होना है । प्रत्येक वह व्यक्ति जिसे अपनी आत्मा के सत्य रूप अर्थात् परम्
सत्य का अंश स्वरूप मानते हुये उसके प्रति सचेत और आदर पूर्वक समर्पित भाव से रहता
है वह सभी अवतारी पुरुष हैं । मानो परम् सत्य अपने को किसी मनुष्य शरीर के आवरण
में ढक कर प्रस्तुत कर रहे हैं । एक निर्विवाद सत्य यह है कि बिना ब्रम्ह की कृपा
के अवतारी पुरूष नहीं हो सकते ।
रविवार, 7 दिसंबर 2014
आत्मीय वृतांत का सार
आत्मा प्रधान व्यक्तित्व के
व्यक्तियों के संसार में प्रचलित नियमों को यदि कंचिद एक शब्द में व्यक्त करना हो
तो अवतार कहा जावेगा । यदि कंचिद परम् सत्य को मानव समाज का रक्षक माना जाय तो वह अपने इस
दायित्व के निर्वाह करने के लिये एक अवतारी पुरुष को सृजित करता है जो कि
समाज में व्याप्त दुष्प्रवृत्तियों का दमन करता है और नियमों का साम्राज्य स्थापित
करता है
शनिवार, 6 दिसंबर 2014
सृष्टि की संरचना और लक्ष्य
इस सृष्टि के समस्त रूपों का सृजन
परम् सत्य ने शून्य से किया है । इस रचना में उन्होने निर्माण सामग्री के रूप में
प्रकृति का प्रयोग किया है । इस सृष्टि का लक्ष्य इन निर्जीव रूपों को ज्ञान के
प्रकाश से प्रकाशित करना है । स्मरणीय है कि इस सृष्टि में परम् सत्य को जानना ही
ज्ञान है । इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिये परम् सत्य ने अपने ही अंश आत्मा को
इसमें पिरोया है । जब आत्मा अपने सत्य स्वरूप को अहसास करते हुये, अपने को परम् सत्य के प्रतिनिधि के रूप में पहचानते हुये, परम् सत्य के लक्ष्य को अपने अस्तित्व का लक्ष्य मानते हुये लक्ष्य की पूर्ति
में संलग्न होता है तो वह अवतारी पुरुष बनता है ।
शुक्रवार, 5 दिसंबर 2014
अवतार का उद्देष्य
यदि इस संसार के समस्त दु:खों एवँ कलह का कारण
मात्र मनुष्य की इच्छाओं से जनित होता तो फिर मछली में कैंसर क्यों पाया जाता है ।
विदित है कि कुछ कमीं अबोध प्रकृति द्वारा भी होती है । अवतारी पुरुष का निखरा
व्यक्तित्व सही अर्थों में यह अध्ययन करने में समर्थ होता है कि परम् सत्य के द्वारा इस
सृष्टि की रचना करने में निहित उद्देष्य और इस संसार का वास्तविक रूप जो विद्यमान है में क्या
भिन्नता है और वह त्रुटि कहाँ से पैदा हो रही है । वह उन त्रुटियों का निवारण भी करता
है ।
गुरुवार, 4 दिसंबर 2014
परम् सत्य के चार रूप
यह वृतांत ग्रंथ महाभारत से उद्घृत
किया जा रहा है । परम् सत्य ने इस मानव समाज को बनाया भी है और वही इसका रक्षक भी है । इस रक्षा के क्रम में उसके
चार रूप हैं - ( 1 ) वह इस समाज में रहकर इंगित करता रहता है कि क्या गलत किया है
इंसान ने ( 2 ) दूसरे रूप में वह त्रुटि बरतते समाज के कृतों की निगरानी करता रहता
है ( 3 ) मानव समाज के कलापों में संलग्न हो उन्हे सम्पन्न कराता है ( 4 ) चौथे
रूप में वह हठात् निद्रा की अवस्था में हो जाता है ।
बुधवार, 3 दिसंबर 2014
पतन से उत्थान की ओर
परम् सत्य ने, अपने स्वयँ प्रत्येक प्राणी में उपस्थित रहते हुये भी, सभी को चुनाव की स्वतंत्रता दे रखी है । परंतु जब कभी मानव समाज गलत चुनाव के
परिणाम स्वरूप अराज़क समाज का विकास कर लेता है तो फिर समाज के उत्थान के लिये किसी
ना किसी को आत्मबोध और आत्मीय जीवन की स्थिति प्राप्त होती है जिसे कि तत्कालीन
काल में अवतार कहा जाता है । यह अवतारी व्यक्ति अधर्म के पंक में फँसे समाज को
अधर्म से उबार धर्मवत् पथ पर चलाने के लिये युग प्रवर्तक का दायित्व निर्वाह करता
है ।
मंगलवार, 2 दिसंबर 2014
विद्वानों का मत
धर्मदर्शन के विख्यात विद्वानों का
यही मत है कि परम् सत्य प्रत्येक जीव में विद्यमान है । उनकी उपस्थिति अंश के रूप
में है, सकारात्मक है, शक्तियुक्त है । उस निरापद अनंत, अभेद्य, अ-खण्ड स्वत: अस्तित्व परम् सत्य का मुनुष्य शरीर जो
कि स्वयँ असत्य प्रकृति द्वारा निर्मित है के साथ सम्बंध अत्यंत आत्मीय होता है
यद्यपि कि इस सम्बंध की परिभाषा करना अथवा व्याख्या करना सम्भव नहीं है ।
सोमवार, 1 दिसंबर 2014
अक्षम प्रकृति
यदि कंचिद प्रकृति में यह क्षमता
होती कि वह एक ऐसे मानव शरीर की रचना करती जो कि निराकार परम् ब्रम्ह को साकार रूप
प्रदान कर देवे अथवा अपनी वंश परम्परा शक्ति द्वारा परम् ब्रम्ह के साक्षात् रूप
को वंशों में अंतरित कर सकती तो सम्भवतया परम् ब्रम्ह का स्वत: अस्तित्व ही
प्रश्नवाचक बन जाता । इस आधार पर परम् ब्रम्ह का किसी मानव शरीर में सीमित हो जाना
स्वत: एक निराधार अभिव्यक्ति बन जाती है ।
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