विद्वान मुनि बामदेव कहते हैं “ मैं मनु हूँ. मैं सूर्य हूँ, मैं विद्वान ऋषि काकसिवान हूँ. मैं संत उस्ना हूँ, ... ... ।
“ यह वृतांत अवतार की धारणा का पोषक है । किसी व्यक्ति की आत्मा जब मुक्त दशा
में हो जाती है तो वह परम् सत्य के साथ विलय का अनुभव करने लगती है । उसके कर्म
परम् सत्य की गरिमा के अनुरूप हो जाते हैं । अवतार का यही स्वरूप होता है ।
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