परम् सत्य तो इस सृष्टि के कण कण
में विद्यमान है । मनुष्य शरीर में विद्यमान आत्मा तो परम् ब्रम्ह का ही अंश है ।
प्रकृति ब्रम्ह की रचना है । यह परम् ब्रम्ह की माया का प्रभाव होता है कि आत्मा
प्रकृतीय मोंह में आसक्ति जनित कर अपनी गरिमा खो बैठता है । अवतारी पुरुष इसी खोई
हुई गरिमा को पुन: स्थापित करता है । वह प्रथमचरण में अपनी आत्मा को माया के
प्रभाव से मुक्ति दिलाता है । पुन: अपनी शरीर की प्रकृति को आत्मा की गरिमा से
संतृप्त करता है । इन प्रयत्नों के द्वारा वह मनुष्य शरीर में परम् ब्रम्ह का ओज
पैदा करता है । वह परम् ब्रम्ह के अवतार के रूप में जाना जाता है । मनुष्य शरीर
द्वारा चर्मोत्कर्ष आदर्श उपलब्धि है अवतार ।
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